ये जग अंधा मै केही समझाऊं ।। एक दो होय उन्हें समझाऊं, सभी भुलाना पेट का धंधा ।। पानी के घोड़ा पवन असवरवा, ढरकि परे जस ओस का बुंदा ।। गहरी नदिया अगम बहे धरवा, खेवनहार के पड़ी गया फंडा ।। घट की वस्तु नजर नहीं आवत, दीया वारी ढूंढत है अंधा ।। लग गयी आग सकल बन जारीगा, बिन गुरु ज्ञान भटकियां …
हम तो सत्य नाम व्योपारी ।। कोई कोई लादें कासा पीतल, कोई कोई लौंग सुपारी । हम तो लाधो नाम धनी को, पूरण खेप हमारी ।। पूंजी न टूटे नफा चौगुना, बनीज कियो हम भारी । हाट जगाती रोक न सकीहैं, निर्भय गैल हमारी ।। मोती बूंद घटहि में उपजे, सुकृत भरत भंडारी । नाम पदारथ लाद चाल्यो है, "धरमदास&…
तू सुमिरन कर ले मेरे मना, तेरी बीती उमर हरि नाम बिना ।। पंछी पंख बिन, हस्ती दन्त बिन, नारी पुरुष बिना । वेश्या पुत्र पिता बिन हीना, तैसे प्राणी हरि नाम बिना ।। देह नैन बिन, रैन चन्द्र बिन, धरती मेघ बिना । जैसे पंडित वेद बिहूना, तैसे प्राणी हरि नाम बिना ।। कूप निर बिनु, धनु छीर बिन, मंदि…
हरि भजन बिना सुख नाहीं रे । नर क्यों बिरथा भटकाई रे ।। काशी गया द्वारका जावे, चार धाम तीरथ फिर आवे। मन की मैल न जाई रे ।। छाप तिलक बहु भांत लगाये, सिर पर जटा विभूति रमाये। हिरदे शांति न आई रे ।। वेद पुराण पढ़े बहु भारी, खंडन मंडन उमर गुजारी। बिरथा लोक बड़ाई रे ।। चार दिवस जग बीच न…
है बहारें बागे दुनिया चन्द रोज। देख लो ! इसका तमाशा चन्द रोज।। ऐ मुसाफिर कुच का सामान कर, इस जहां में है बसेरा चन्द रोज।। पूछा लुकमा से जिया तू कितने रोज, दस्ते हसरत मल के बोला चन्द रोज।। बादे मदफन कब्र में बोली कजा, अब यहां पर सोते रहना चन्द रोज।। क्यों सताते हो दिले बेजुर्म को, जालि…
हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी ।। काटे से कटत नाही, जारे से जरत नाही, निशदिन रहत हरि ।। यह तो जड़ी मोहे प्यारी लागे, अमृत रस से भरी ।। काया नगर में अधर एक बंगला, ता में गुप्त धरी ।। पांच नाम पच्चीस नागिनी, सूचत तुरत मरी ।। इस काली ने सब जग खाया, सदगुरु देख डरी ।। कहे कबीर सुनो भाई स…
ऐसी करी गुरुदेव दया, मेरा मोह का बन्धन तोड़ दिया।। दौड़ रहा दिन रात सदा, जग के सब कार बिहारन में। सपने सम विश्व दिखाय मुझे, मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया।। कोई शेष गणेश महेश रटे, कोई पूजत पीर पैगम्बर को। सब पंथ गिरंथ छुड़ा करके, इक ईश्वर में मन जोड़ दिया।। कोई ढुंढत है मथुरा नगरी, कोई जा…
अचरज देखा भारी साधो, अचरज देखा भारी रे ।। गगन बीच अमृत का कूवां, झरे सदा सुखकारी रे।। पंगु पुरुष चढे़ बिन सीढ़ी, पीवे भर भर झारी रे।। बिना बजाये निशदिन बाजे, घण्टा शंख नगारी रे।। बहरा सुन सुन मस्त होत है, तन की खबर बिसारी रे।। बिन भूमि के महल बना है, तामें ज्योति उजारी रे।। अंधा देख द…
कामिल काम कमाल किया, तैंने ख्याल से खेल बनाय दिया || नहीं कागज कलम जरुरत है, बिन रंग बनी सब मूरत है | इन मूरत में एक सूरत है, तैंने एक अनेक लखाय दिया || जल बून्द को लेकर देह रची, सुर दानव मानव जीव जुदा | सबके घट अन्दर मंदिर में, तैंने आप मुकाम जमाय दिया || कोई पार न वार अधार बिना, …
गुरु बिन कौन मिटावे भव दुख, गुरु बिन कौन मिटावे रे || गहरी नदिया वेग बडो है, बहत जीव सब जावें रे | कर किरपा गुरु पकड भुजा से, खेंच तीर पर लावें रे || काम क्रोध मद लोभ चार मिल, लूट लूट कर खावें रे | ज्ञान खंग देकर कर माहीं, सबको मार भगावें रे || जाना दूर रात अंधियारी, गैला नजर न आवे…
ऊधो मोहे संत सदा अति प्यारे | जाकि महिमा वेद उचारे || मेरे कारण छोड जगत के भोग पदारथ सारे | निशदिन ध्यान धरें हिरदे में, सब जग काज बिसारे || मैं संतन के पीछे जाऊँ, जहां जहां संत सिधारे | चरणन रज निज अंग लगाऊँ, शोधूं गात हमारे || संत मिले तब मैं मिल जाऊँ, संत न मुझसे न्यारे | बिन सतस…
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