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ऐसी करी गुरुदेव दया

 



ऐसी करी गुरुदेव दया,

मेरा मोह का बन्धन तोड़ दिया।।


दौड़ रहा दिन रात सदा,

जग के सब कार बिहारन में।


सपने सम विश्व दिखाय मुझे,

मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया।।


कोई शेष गणेश महेश रटे,

कोई पूजत पीर पैगम्बर को।


सब पंथ गिरंथ छुड़ा करके,

इक ईश्वर में मन जोड़ दिया।।


कोई ढुंढत है मथुरा नगरी,

कोई जाय बनारस बास करे।


जब व्यापक रुप पिछान लिया,

सब भरम का भण्ड़ा फोड़ दिया।


कौन करुं गुरुदेव कू भेंट,

न वस्तु दिखे तिहुं लोकन में।


"बह्मानन्द" समान न होय कभी,

धन माणिक लाख करोड़ दिया।।

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