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है बहारें बागे दुनिया चन्द रोज

 



है बहारें बागे दुनिया चन्द रोज।

देख लो ! इसका तमाशा चन्द रोज।।


ऐ मुसाफिर कुच का सामान कर,

इस जहां में है बसेरा चन्द रोज।।


पूछा लुकमा से जिया तू कितने रोज, 

दस्ते हसरत मल के बोला चन्द रोज।।


बादे मदफन कब्र में बोली कजा,

अब यहां पर सोते रहना चन्द रोज।।


क्यों सताते हो दिले बेजुर्म को, 

जालिमों यह है जमाना चन्द रोज।।


तुम कहा और मैं कहां ऐ दोस्तो,

साथ है मेरा तुम्हारा चन्द रोज।।


याद कर तू ऐ "नज़ीर" कब्रों के रोज, 

ज़िंदगी का है भरोसा चन्द रोज।।

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