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हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी

 



हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी ।।

काटे से कटत नाही, 

जारे  से जरत नाही,

निशदिन रहत हरि ।।


यह तो जड़ी मोहे प्यारी लागे,

अमृत रस से भरी ।।


काया नगर में अधर एक बंगला,

ता में गुप्त धरी ।।


पांच नाम पच्चीस नागिनी,

सूचत तुरत मरी ।।


इस काली ने सब जग खाया,

सदगुरु देख डरी ।।


कहे कबीर सुनो भाई साधो, 

काहू बिरले के हाथ परी ।।

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