ये जग अंधा मै केही समझाऊं ।।
एक दो होय उन्हें समझाऊं,
सभी भुलाना पेट का धंधा ।।
पानी के घोड़ा पवन असवरवा,
ढरकि परे जस ओस का बुंदा ।।
गहरी नदिया अगम बहे धरवा,
खेवनहार के पड़ी गया फंडा ।।
घट की वस्तु नजर नहीं आवत,
दीया वारी ढूंढत है अंधा ।।
लग गयी आग सकल बन जारीगा,
बिन गुरु ज्ञान भटकियां वंदा ।।
कहत कबीर सुनो भाई सन्तों,
एक दिन जाये लंगोटी झाड़ बन्दा ।।

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