गुरु बिन कौन मिटावे भव दुख,
गुरु बिन कौन मिटावे रे ||
गहरी नदिया वेग बडो है,
बहत जीव सब जावें रे |
कर किरपा गुरु पकड भुजा से,
खेंच तीर पर लावें रे ||
काम क्रोध मद लोभ चार मिल,
लूट लूट कर खावें रे |
ज्ञान खंग देकर कर माहीं,
सबको मार भगावें रे ||
जाना दूर रात अंधियारी,
गैला नजर न आवे रे |
सीधे मारग पर पग धर कर,
सुख से धाम पुगावें रे ||
तन मन धन सब अपॅण करके,
जो गुरुदेव रिझावे रे |
' ब्रह्मानंद ' भवसागर दुस्तर, सो सहजे तर जावे रे ||

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