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हरि भजन बिना सुख नाहीं

 



हरि भजन बिना सुख नाहीं रे ।

नर क्यों बिरथा भटकाई रे ।।


काशी गया द्वारका जावे, 

चार धाम तीरथ फिर आवे। 

मन की मैल न जाई रे ।।


छाप तिलक बहु भांत लगाये, 

सिर पर जटा विभूति रमाये। 

हिरदे शांति न आई रे ।।


वेद पुराण पढ़े बहु भारी, 

खंडन मंडन उमर गुजारी। 

बिरथा लोक बड़ाई रे ।।


चार दिवस जग बीच निवासा, 

'ब्रह्मानंद' छोड़ सब आशा ।

प्रभु चरणन चित लाई रे ।।


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