दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरी अंखियां प्यासी रे ।
मन मंदिर का दीप जला दो घट-घट बासी रे ।।
मंदिर मंदिर मूरत तेरी,
फिर भी न देखी सूरत तेरी ।
युग बीते ना आई मिलन की,
पूर्णमासी रे ।।
द्वार दया का जब तू खोले,
पंचम स्वर में गूंगा बोले ।
अंधा देखे लंगड़ा चल कर,
पहुंचे काशी रे ।।
द्वार खड़ा तेरा मतवाला,
मांगे तुमसे हार निराला ।
’नरसी’ की यह विनती सुन लो,
हे दु:ख नाशी रे ।।

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