लेबल

सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
कबीरवाणी लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ये जग अंधा मै केही समझाऊं

ये जग अंधा मै केही समझाऊं ।। एक दो होय उन्हें समझाऊं, सभी भुलाना पेट का धंधा ।। पानी के घोड़ा पवन असवरवा, ढरकि परे जस ओस का बुंदा ।। गहरी नदिया अगम बहे धरवा, खेवनहार के पड़ी गया फंडा ।। घट की वस्तु नजर नहीं आवत, दीया वारी ढूंढत है अंधा ।। लग गयी आग सकल बन जारीगा, बिन गुरु ज्ञान भटकियां …

हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी

हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी ।। काटे से कटत नाही,  जारे  से जरत नाही, निशदिन रहत हरि ।। यह तो जड़ी मोहे प्यारी लागे, अमृत रस से भरी ।। काया नगर में अधर एक बंगला, ता में गुप्त धरी ।। पांच नाम पच्चीस नागिनी, सूचत तुरत मरी ।। इस काली ने सब जग खाया, सदगुरु देख डरी ।। कहे कबीर सुनो भाई स…