लेबल

सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
ब्रह्मानंदजी लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भाग्य बड़े सदगुरू मैं पायो

भाग्य बड़े सदगुरू मैं पायो, मन की दुविधा दूर नशाई ।। बाहर ढूंढ फिरा मैं जिसको, सो वस्तु घट भीतर पाई ।। सकल जून जीवन के माही, पूरण ब्रह्म ज्योति दर्शाई ।। जनम जनम के बन्धन काटे, चौरासी लख त्रास मिटाई  ।। ब्रह्मानन्द चरण बलिहारी, गुरु महिमा हरि से अधिकाई ।।

हरि भजन बिना सुख नाहीं

हरि भजन बिना सुख नाहीं रे । नर क्यों बिरथा भटकाई रे ।। काशी गया द्वारका जावे,  चार धाम तीरथ फिर आवे।  मन की मैल न जाई रे ।। छाप तिलक बहु भांत लगाये,  सिर पर जटा विभूति रमाये।  हिरदे शांति न आई रे ।। वेद पुराण पढ़े बहु भारी,  खंडन मंडन उमर गुजारी।  बिरथा लोक बड़ाई रे ।। चार दिवस जग बीच न…

ऐसी करी गुरुदेव दया

ऐसी करी गुरुदेव दया, मेरा मोह का बन्धन तोड़ दिया।। दौड़ रहा दिन रात सदा, जग के सब कार बिहारन में। सपने सम विश्व दिखाय मुझे, मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया।। कोई शेष गणेश महेश रटे, कोई पूजत पीर पैगम्बर को। सब पंथ गिरंथ छुड़ा करके, इक ईश्वर में मन जोड़ दिया।। कोई ढुंढत है मथुरा नगरी, कोई जा…

अचरज देखा भारी साधो

अचरज देखा भारी साधो,  अचरज देखा भारी रे ।। गगन बीच अमृत का कूवां, झरे सदा सुखकारी रे।। पंगु पुरुष चढे़ बिन सीढ़ी, पीवे भर भर झारी रे।। बिना बजाये निशदिन बाजे, घण्टा शंख नगारी रे।। बहरा सुन सुन मस्त होत है, तन की खबर बिसारी रे।।  बिन भूमि के महल बना है, तामें ज्योति उजारी रे।। अंधा देख द…

कामिल काम कमाल किया

कामिल काम कमाल किया,  तैंने ख्याल से खेल बनाय दिया || नहीं कागज कलम जरुरत है,  बिन रंग बनी सब मूरत है | इन मूरत में एक सूरत है,  तैंने एक अनेक लखाय दिया || जल बून्द को लेकर देह रची,  सुर दानव मानव जीव जुदा | सबके घट अन्दर मंदिर में,  तैंने आप मुकाम जमाय दिया || कोई पार न वार अधार बिना, …

गुरु बिन कौन मिटावे भव दुख

गुरु बिन कौन मिटावे भव दुख, गुरु बिन कौन मिटावे रे || गहरी नदिया वेग बडो है,  बहत जीव सब जावें रे | कर किरपा गुरु पकड भुजा से,  खेंच तीर पर लावें रे || काम क्रोध मद लोभ चार मिल,  लूट लूट कर खावें रे | ज्ञान खंग देकर कर माहीं,  सबको मार भगावें रे || जाना दूर रात अंधियारी,  गैला नजर न आवे…

ऊधो मोहे संत सदा अति प्यारे

ऊधो मोहे संत सदा अति प्यारे | जाकि महिमा वेद उचारे || मेरे कारण छोड जगत के भोग पदारथ सारे | निशदिन ध्यान धरें हिरदे में,  सब जग काज बिसारे || मैं संतन के पीछे जाऊँ,  जहां जहां संत सिधारे | चरणन रज निज अंग लगाऊँ,  शोधूं गात हमारे || संत मिले तब मैं मिल जाऊँ,  संत न मुझसे न्यारे | बिन सतस…