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दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरी अंखियां प्यासी रे

दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरी अंखियां प्यासी रे । मन मंदिर का दीप जला दो घट-घट बासी रे ।। मंदिर मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न देखी सूरत तेरी । युग बीते ना आई मिलन की, पूर्णमासी रे  ।। द्वार दया का जब तू खोले, पंचम स्वर में गूंगा बोले । अंधा देखे लंगड़ा चल कर, पहुंचे काशी रे  ।। द्वार खड़ा तेरा …

ये जग अंधा मै केही समझाऊं

ये जग अंधा मै केही समझाऊं ।। एक दो होय उन्हें समझाऊं, सभी भुलाना पेट का धंधा ।। पानी के घोड़ा पवन असवरवा, ढरकि परे जस ओस का बुंदा ।। गहरी नदिया अगम बहे धरवा, खेवनहार के पड़ी गया फंडा ।। घट की वस्तु नजर नहीं आवत, दीया वारी ढूंढत है अंधा ।। लग गयी आग सकल बन जारीगा, बिन गुरु ज्ञान भटकियां …

हम तो सत्य नाम व्योपारी

हम तो सत्य नाम व्योपारी ।। कोई कोई लादें कासा पीतल, कोई कोई लौंग सुपारी । हम तो लाधो नाम धनी को,  पूरण खेप हमारी ।। पूंजी न टूटे नफा चौगुना, बनीज कियो हम भारी । हाट जगाती रोक न सकीहैं, निर्भय गैल हमारी ।। मोती बूंद घटहि में उपजे, सुकृत भरत भंडारी । नाम पदारथ लाद चाल्यो है, "धरमदास&…

तू सुमिरन कर ले मेरे मना

तू सुमिरन कर ले मेरे मना, तेरी बीती उमर हरि नाम बिना ।। पंछी पंख बिन, हस्ती दन्त बिन, नारी पुरुष बिना । वेश्या पुत्र पिता बिन हीना, तैसे प्राणी हरि नाम बिना ।। देह नैन बिन, रैन चन्द्र बिन, धरती मेघ बिना । जैसे पंडित वेद बिहूना, तैसे प्राणी हरि नाम बिना ।। कूप निर बिनु, धनु छीर बिन, मंदि…

हरि भजन बिना सुख नाहीं

हरि भजन बिना सुख नाहीं रे । नर क्यों बिरथा भटकाई रे ।। काशी गया द्वारका जावे,  चार धाम तीरथ फिर आवे।  मन की मैल न जाई रे ।। छाप तिलक बहु भांत लगाये,  सिर पर जटा विभूति रमाये।  हिरदे शांति न आई रे ।। वेद पुराण पढ़े बहु भारी,  खंडन मंडन उमर गुजारी।  बिरथा लोक बड़ाई रे ।। चार दिवस जग बीच न…

है बहारें बागे दुनिया चन्द रोज

है बहारें बागे दुनिया चन्द रोज। देख लो ! इसका तमाशा चन्द रोज।। ऐ मुसाफिर कुच का सामान कर, इस जहां में है बसेरा चन्द रोज।। पूछा लुकमा से जिया तू कितने रोज,  दस्ते हसरत मल के बोला चन्द रोज।। बादे मदफन कब्र में बोली कजा, अब यहां पर सोते रहना चन्द रोज।। क्यों सताते हो दिले बेजुर्म को,  जालि…

हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी

हमारे गुरु ने दीनी अमृत नाम जड़ी ।। काटे से कटत नाही,  जारे  से जरत नाही, निशदिन रहत हरि ।। यह तो जड़ी मोहे प्यारी लागे, अमृत रस से भरी ।। काया नगर में अधर एक बंगला, ता में गुप्त धरी ।। पांच नाम पच्चीस नागिनी, सूचत तुरत मरी ।। इस काली ने सब जग खाया, सदगुरु देख डरी ।। कहे कबीर सुनो भाई स…