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भाग्य बड़े सदगुरू मैं पायो

 



भाग्य बड़े सदगुरू मैं पायो,

मन की दुविधा दूर नशाई ।।


बाहर ढूंढ फिरा मैं जिसको,

सो वस्तु घट भीतर पाई ।।


सकल जून जीवन के माही,

पूरण ब्रह्म ज्योति दर्शाई ।।


जनम जनम के बन्धन काटे,

चौरासी लख त्रास मिटाई  ।।


ब्रह्मानन्द चरण बलिहारी,

गुरु महिमा हरि से अधिकाई ।।

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